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अपनत्व की भावना -थोड़ा सा दाना- थोड़ा सा पानी.

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अजय पांडे:-

जिंदगी बहार है , बहार बांटते चलो, नकद बांटते चलो, उधार बांटते चलो ! सांस के सधे हुए सितार बांटते चलो !
मौत का पता नहीं, न उम्र का पता यहां ! क्या पता नसीब का जिंदगी कटे कहां !! गांव-गली नगर-डगर, प्यार बांटते चलो ! जिंदगी बहार है बहार बांटते चलो !!

पंछियों को दाना-पानी देने की सेवा वर्ष 2013 से लगातार जारी है, आइये आप भी दैनिक भास्कर की इस मुहिम और नेक कार्य में हाथ बंटाइये – पंछियों के मित्र बन जाइए ..

Nikita Wagde
the authorNikita Wagde

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