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अपनत्व की भावना -थोड़ा सा दाना- थोड़ा सा पानी.

अजय पांडे:- जिंदगी बहार है , बहार बांटते चलो, नकद बांटते चलो, उधार बांटते चलो ! सांस के सधे हुए सितार बांटते चलो ! मौत का पता नहीं, न उम्र का पता यहां ! क्या पता नसीब का जिंदगी कटे...